तथागत बुद्ध का संबोधन
🌻धम्म प्रभात🌻
🌳निरन्तर आत्मचिंतन करो 🌳 तथागत बुद्ध
श्रावस्ती के जेतवन विहार में भिक्खुओं को संबोधित करते हुए भगवान ने कहा --
भिक्खुओं ! यह संसार अनन्त हैं ।अविद्या के अन्धकार में पडे, तृष्णा के बन्धन से बँधे तथा आवागमन में भटकते रहनेवाले को इस संसार के आदि का पता नहीं लगता हैं ।
भिक्खुओं ! जैसे, कोई कुत्ता एक गढे खूंटे में बँधा हो । यदि वह चलता हैं तो उसी खूँटे के इर्द-गिर्द ।यदि वह खडा होता हैं तो उसी खूँटे के इर्द-गिर्द । यदि वह बैठता हैं तो उसी खूँटे के इर्द-गिर्द । यदि वह लेटता हैं तो उसी खूँटे के इर्द-गिर्द ।
वैसे ही, अज्ञ पृथक्जन रूप को समझता हैं कि मेरा हैं, यह मैं हूँ, यह मेरी आत्मा हैं । वैसे ही वेदना को समझता हैं ।
वैसे संस्कार को समझता हैं, विज्ञान को समझता हैं ।यदि वह चलता हैं तो इन्हीं पाँच उपादान स्कन्धों के इर्द-गिर्द । यदि खडा होता हैं तो इन्हीं पाँच उपादान स्कन्धों के इर्द-गिर्द । वैसे बैठता हैं, लेटता हैं तो इन्हीं पाँच उपादान स्कन्धों के इर्द-गिर्द ।
भिक्खुओं ! इसलिए, निरन्तर आत्मचिंतन ( स्वयंचिंतन) करते रहना चाहिए । यह चित्त बहुत काल से राग, द्वेष और मोह से गंदा बना हैं ।
भिक्खुओं !"चित्त की गन्दगी से प्राणी गन्दे होते हैं और चित्त की शुद्धि से प्राणी विशुद्ध होते हैं ।
भिक्खुओं ! चित्रकार को देखो, रंगरेज को देखो, पटहरियों को देखो, वे कैसे विचार- विचार कर, सोच- सोच कर चित्र बनाते हैं, रंग भरते हैं और सर्वाङ्गपूर्ण चित्र उतारते हैं । वैसे, चित्त के मैल -राग, द्वेष और मोह को नि:शेष करने के लिए निरन्तर आत्मचिंतन करो - स्वयंचिंतन करो ।
अंधकार दूर होगा, अविद्या नष्ट होगी, जन्म-मरण से मुक्ति मिलेगी ।
नमो बुद्धाय 👏👏👏
🌳निरन्तर आत्मचिंतन करो 🌳 तथागत बुद्ध
श्रावस्ती के जेतवन विहार में भिक्खुओं को संबोधित करते हुए भगवान ने कहा --
भिक्खुओं ! यह संसार अनन्त हैं ।अविद्या के अन्धकार में पडे, तृष्णा के बन्धन से बँधे तथा आवागमन में भटकते रहनेवाले को इस संसार के आदि का पता नहीं लगता हैं ।
भिक्खुओं ! जैसे, कोई कुत्ता एक गढे खूंटे में बँधा हो । यदि वह चलता हैं तो उसी खूँटे के इर्द-गिर्द ।यदि वह खडा होता हैं तो उसी खूँटे के इर्द-गिर्द । यदि वह बैठता हैं तो उसी खूँटे के इर्द-गिर्द । यदि वह लेटता हैं तो उसी खूँटे के इर्द-गिर्द ।
वैसे ही, अज्ञ पृथक्जन रूप को समझता हैं कि मेरा हैं, यह मैं हूँ, यह मेरी आत्मा हैं । वैसे ही वेदना को समझता हैं ।
वैसे संस्कार को समझता हैं, विज्ञान को समझता हैं ।यदि वह चलता हैं तो इन्हीं पाँच उपादान स्कन्धों के इर्द-गिर्द । यदि खडा होता हैं तो इन्हीं पाँच उपादान स्कन्धों के इर्द-गिर्द । वैसे बैठता हैं, लेटता हैं तो इन्हीं पाँच उपादान स्कन्धों के इर्द-गिर्द ।
भिक्खुओं ! इसलिए, निरन्तर आत्मचिंतन ( स्वयंचिंतन) करते रहना चाहिए । यह चित्त बहुत काल से राग, द्वेष और मोह से गंदा बना हैं ।
भिक्खुओं !"चित्त की गन्दगी से प्राणी गन्दे होते हैं और चित्त की शुद्धि से प्राणी विशुद्ध होते हैं ।
भिक्खुओं ! चित्रकार को देखो, रंगरेज को देखो, पटहरियों को देखो, वे कैसे विचार- विचार कर, सोच- सोच कर चित्र बनाते हैं, रंग भरते हैं और सर्वाङ्गपूर्ण चित्र उतारते हैं । वैसे, चित्त के मैल -राग, द्वेष और मोह को नि:शेष करने के लिए निरन्तर आत्मचिंतन करो - स्वयंचिंतन करो ।
अंधकार दूर होगा, अविद्या नष्ट होगी, जन्म-मरण से मुक्ति मिलेगी ।
नमो बुद्धाय 👏👏👏
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