जरा-मरण

🌻घम्म प्रभात🌻

जरामरण ( वृद्धावस्था - मृत्यु)
(प्रतीत्य समुत्पाद की बारहवीं कडी)

जातिपच्चया जरामरणं।

जाति (जन्म) के कारण (प्रत्यय) से जरा और मरण।

धम्म सेनापति सारिपुत्त ने भिक्खुओं को संबोधित करते हुए कहा - -
जरा-मरण क्या है? जरा-मरण का समुदय क्या है? जरा-मरण का निरोध क्या है? और क्या है जरा-मरण निरोध-गामिनी प्रतिपद?

भन्ते सारिपुत्त ने कहा -

जो उन प्राणियों की उन-उन प्राणी शरीर में बुढापा, जीर्णता, दांत टूटना, बाल पकना, झुर्री पडना, आयु क्षय, इंद्रिय विकार- यही कही जाती हैं जरा।

- जो उन प्राणियों की उन-उन प्राणी शरीर से च्युति, भेद, अंतर्ध्यान, मृत्यु, कालक्रिया, स्कंधों का विलिन होना, कलेवर का पतन - यही मरण हैं।
इस प्रकार यह जरा और मरण दोनों मिलकर जरा-मरण होते हैं।

जन्म का होना ही जरा-मरण का कारण होता हैं। जन्म रूक जानेसे जरा-मरण रुक जाते हैं।

तथागत बुद्ध ने जरा-मरण से मुक्त होने के लिए  आठ अंग वाला मार्ग - - आर्य अष्टांग मार्ग जरा-मरण निरोध-गामिनी प्रतिपद - मार्ग का उपदेश दिया हैं

"Death(मरण) is the temporary end of a temporary phenomenon ". By death is meant the extinction of psychic life (जिवितेन्द्रिय), heat (तेजोधातु), and consciousness (विज्ञान ) of one individual in a particular existence. Death is not the complete annihilation of a being. Death in one place means the birth in another place, just as, in conventional terms, the rising of the sun in one place means the setting of the sun in another place.

तथागत बुद्ध ने कहा है - जाति भी दुःख है, जरा भी दुःख है, मरण भी दुःख हैं। जीवन में परिदेव, दौर्मनस्य, उपायास भी दुःख हैं। जीवन में अप्रिय का मिलना, प्रिय का बिछडना और इच्छित न मिलना भी दुःख हैं।

यह सब दुःखों की जननी अविद्या हैं।

अविद्या का निरोध ही सभी दुःखों से मुक्ति हैं।

नमो बुद्धाय 

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