अंबेडकर जयंती
अंबेडकर जयंती के मायने ?
गले में माला और विचारों पर ताला...?
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इस वर्ष 14 अप्रैल दिन शुक्रवार को डॉ. अंबेडकर की 126वीं जयंती है। संसद मार्ग से लेकर पूरा देश बाबामय हो जायेगा। सेमीनार-संगोष्ठी, प्रदर्शनी और तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे और इस तरह के कार्यक्रम दुनिया भर में आयोजित किए जाएंगे। वोट की ताकत ने वैसे लोगों को भी अंबेडकर जयंती मनाने के लिए मजबूर किया है, जो डॉ.अंबेडकर के विचारों के कट्टर विरोधी हैं और यदि वश चले तो अपनी स्मृति से भी डॉ.अंबेडकर के नाम को भस्म कर दें। दुनिया का कोई भी व्यक्ति ‘स्व-निर्मित’ नहीं होता। वह अपनी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत और परिस्थितियों का उप-उत्पाद होता है और व्यक्ति के व्यक्तित्व और कृतित्व के निर्माण में उसके घर-परिवार, शिक्षक, मित्र, शुभचिंतक और ‘शत्रुओं’ का भी योगदान होता है। दुनिया का महान से महान व्यक्ति भी इस सूत्र से परे नहीं है। इसलिए डॉ.अंबेडकर के व्यक्तित्व और उनके विचारों को समझने के लिए महात्मा बुद्ध से लेकर संत कबीर, संत रविदास और महात्मा फुले तक की बौद्धिक विरासत को समझना आवश्यक है। दूसरे, दुनिया का हर महान व्यक्ति एक विश्व-विरासत है, किसी के कॉपी राईट से परे। बौद्धिक विरासत अर्जित की जा सकती है, जो वंश, जाति, काल और भूगोल से परे है। निःसंदेह डॉ.अंबेडकर सिर्फ़ भारत के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के धरोहर हैं, लेकिन एक वस्तुनिष्ठ सवाल तो बनता ही है कि जिस राष्ट्र को डॉ.अंबेडकर ने इतना सब कुछ दिया क्या उसी राष्ट्र के सत्ताशीन लोगों ने अंबेडकर को स्वीकार किया ? क्या उनके योगदानों को दबाने की साजिश नहीं की गई ? क्या वह समाज अंबेडकर को आज भी स्वीकार करता है ? इस प्रश्नों की पड़ताल जरुरी है। यदि जबाव न में है तो इस विमर्श से थोड़े समय के लिए इस वर्ग को अलग करता हूँ। रही बात OBC और ST वर्ग की। यह सत्य है कि इन दोनों वर्गों में डॉ.अंबेडकर की स्वीकार्यता नहीं रही, उचित जानकारी के आभाव में इन्हें लगता रहा कि डॉ.अंबेडकर ने इनके लिए कुछ या फिर कहिए कुछ ज्यादा नहीं किया। हालाँकि हाल के दिनों में इस वर्ग के कुछ उद्धमी और गंभीर बुद्धिजीवियों के सतत प्रयास से इस वर्ग में डॉ.अंबेडकर की स्वीकार्यता बढ़ी है।
भारत में डॉ.अंबेडकर पर सबसे ज्यादा कॉपीराईट का दावा करने वाला समुदाय है- अनुसूचित जाति वर्ग। डॉ.अंबेडकर ने 18मार्ग1956 को रामलीला मैदान, आगरा वाले अपने भाषण में कहा था, “हमारे समाज की शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहूँच गये हैं, परन्तु इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मै आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे, किन्तु मैं देख रहा हूँ कि छोटे और बड़े क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपना पेट भरने में व्यस्त हैं। मेरा आग्रह है कि जो लोग शासकीय सेवाओं में नियोजित हैं, उनका कर्तव्य है कि वे अपने वेतन का 20वां भाग (5%) स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु दें। तभी समग्र समाज प्रगति कर सकेगा अन्यथा केवल चन्द लोगों का ही सुधार होता रहेगा। कोई बालक जब गांव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तो संपूर्ण समाज की आशायें उस पर टिक जाती हैं। एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता समाज के लिये वरदान साबित हो सकता है।” यह डॉ. अंबेडकर का आत्म-परक अनुभव था। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि अंबेडकर के विचारों और उनके व्यक्तित्व को पढ़े-लिखे लोगों ने ही पुनर्जीवित किया है। 21वीं सदी का यह दौर त्रासदी का युग है। जहाँ एक ओर दुनिया भर में अंबेडकर की स्वीकार्यता बड़ी है, वहीं दूसरी ओर अंबेडकर को दैवीय बनाने की साजिश भी चल रही है- अर्थात् अंबेडकर को पूजो, फूल-माला चढ़ाओ, भजन-कीर्तन करों, लेकिन उनके विचारों को न पढ़ो और न अपनाओ। बहरहाल त्रासदी के इस मोड़ पर, डॉ.अंबेडकर को लेकर अनुसूचित जाति के बीच ही दावेदारी का जो संघर्ष है, उसकी समीक्षा जरुरी है। यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो इस प्रक्रिया में दो तरह के लोग हैं: पहला, वैसे लोग जो वास्तव में अंबेडकर की बौद्धिक और राजनीतिक समझ के अनुरूप काम करने का प्रयास कर रहे हैं। ध्यान देने की जरुरत है, ‘प्रयास कर रहे हैं’! ऐसे लोगों, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की संख्या बहुत कम है। एक दूसरे तरह के अंबेडकरवादी भी हैं, जिन्होंने अंबेडकर को अपने-२ हित और सुविधा के लिए अलग-२ खानों में बाँट लिया है। यदि आम शब्दों में कहें तो- महार अंबेडकरवादी, चमार अंबेडकरवादी, दुसाध अंबेडकरवादी, धोबी अंबेडकरवादी, पासी अंबेडकरवादी, वाल्मीकि अंबेडकरवादी इत्यादि। यदि अभी अंबेडकर जीवित होते तो शायद बहुत दुखी होते। अंबेडकर की विरासत का यह वर्गीकरण वस्तुतः अंबेडकर के विचारों की हत्या करना है और वैसी विचारधारा का पोषण करना है जिसके विरुद्ध अंबेडकर आजीवन संघर्ष करते रहे और अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर घृणा और असमानता पर आधारित ‘हिन्दू’ धर्म का परित्याग किया।
यह जाति है की जाती ही नहीं और न जाएगी। जाति जन्मना है, अर्थात् एक व्यक्ति अपनी राष्ट्रीयता, धर्म, संस्कृति, भाषा, खान-पान बदल सकता है. परन्तु उसकी जाति नहीं बदलती। गर्भ धारण में ही व्यक्ति की जाति तय हो जाती है और इस सृष्टि के जीवित रहने तक उसकी जातीय पहचान बनी रहती है। अंबेडकर के काल में भी जातियां थीं और अंबेडकर को न सिर्फ़ उनके विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा जो उनके नैसर्गिक शत्रु थे बल्कि उनके विरुद्ध भी संघर्ष करना पड़ा जो तथाकथित उनके ‘अपने’ थे। अंबेडकर को ‘अछूतों' ने भी काले झंडे दिखाए, आक्रमण किए, विरोध किया। लेकिन क्या अंबेडकर ने जाति की बात की या जमात की ? निःसंदेह डॉ.अंबेडकर ने ‘जमात’ को आधार बनाया। अब यह समझना पड़ेगा कि अंबेडकर के ‘अनुयायियों’ ने ही अंबेडकर को जातीय खांचे में क्यों बाँट दिया ? इस स्थिति का सीधा कारण महत्वकांक्षी अनुसूचित मध्यम वर्ग के बीच व्यक्तिगत मुक्ति की चाहत और बेचैनी है। वर्ण व्यवस्था आधारित समाज में व्यक्तिगत मुक्ति के लिए हर समय स्पेस रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो प्राचीन काल में शूद्र कुल में जन्मे बहुत सारे राजा और अधिकारी नहीं होते। व्यक्तिगत मुक्ति से किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत (Social Status) बढ़ सकती है अर्थात् वह सांसद, विधायक, मंत्री, अधिकारी, संपन्न बन सकता है, लेकिन सामाजिक कद (Social Stature) बढ़ाने के लिए व्यक्ति और जाति नहीं बल्कि जमात की समस्या का समाधान जरुरी है। कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें जो अधिकार और सुरक्षा प्राप्त हुए हैं, वे जाति के कारण प्राप्त हुए हैं। इस तरह के विचार में मैं विनम्रता के साथ संशोधन करना चाहता हूँ। संविधान के प्रावधानों और आपके जाति प्रमाण पत्र पर एक बार गंभीरता से नज़र डालने की जरुरत है। जाति-व्यवस्था पर डॉ.अंबेडकर के जीवन भर के परिश्रम और शोध की परिणति आप संविधान के प्रावधानों में पाएंगे। उन्होंने हजारों विखंडित जातियों और समुदायों को वर्ग में तब्दील किया अर्थात SC, ST, OBC और सबकी सुरक्षा के लिए संविधान में प्रावधान किए- OBC के लिए Article 340, SC के लिए Article 341 और ST के लिए Article 341। पिछड़े वर्ग के साथी ध्यान से देखें, डॉ. अंबेडकर ने संविधान में सबसे पहले OBC के लिए प्रावधान किया अर्थात डॉ.अंबेडकर ने जमात के अधिकार सुरक्षित किए, जिसमें जाति सन्निहित है।
👉जाति और जमात :- महात्मा गौतम बुद्ध से लेकर मा. कांशीराम तक की बौद्धिक विरासत को देखें तो सबने ‘जमात’ की वकालत की और महान बने। मा.रामबिलास पासवान- 1990 के दशक तक ‘जमात’ की बात करते थे- उस समय देश के एक बड़े नेता थे। अब जाति क्या परिवार तक उतर आये हैं। उनकी स्थिति का मूल्यांकन आप स्वयं करें। डॉ.उदित राज- पहले रामराज थे और दलित कर्मचारियों का फेडरेशन चलाते थे, देश में बड़े नेता माने जाते थे, आज उनकी हालत का मूल्यांकन भी आप को ही करना है। जब सुश्री मायावती ने कांशीराम जी के बहुजन को ‘जाटव-जन’ और ‘सर्वजन’ अर्थात शोषकों को भी तरजीह और मा.मुलायम सिंह और उनके आधुनिक शिक्षा प्राप्त पुत्र मा.अखिलेश यादव ने लोहिया के समाजवाद को ‘यादव-जन’ में तब्दील कर दिया तब 2017 के चुनाव में क्या हालत हुई आप स्वयं जानते हैं। दोनों को रात में बुरे-बुरे सपने आते होंगे। सनद रहे, विशुद्ध ‘स्व-जातीय’ राजनीति करने वालों में ‘परिवारवादी’ होने की प्रबल संभावना होती है।
डॉ.अंबेडकर यदि सिर्फ़ व्यक्तिगत और जातिगत मुक्ति की बात किए होते तो आज हम उनकी जयंती नहीं मना रहे होते। जाति की राजनीति में व्यक्तिगत मुक्ति संभव, लेकिन वंचित समाज की मुक्ति के लिए ‘जमात’ की राजनीति पहली शर्त है।
उनकी पूजा करने की बजाय उनके आदर्शों पर चलें......!
गले में माला और विचारों पर ताला...?
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इस वर्ष 14 अप्रैल दिन शुक्रवार को डॉ. अंबेडकर की 126वीं जयंती है। संसद मार्ग से लेकर पूरा देश बाबामय हो जायेगा। सेमीनार-संगोष्ठी, प्रदर्शनी और तरह-तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जायेंगे और इस तरह के कार्यक्रम दुनिया भर में आयोजित किए जाएंगे। वोट की ताकत ने वैसे लोगों को भी अंबेडकर जयंती मनाने के लिए मजबूर किया है, जो डॉ.अंबेडकर के विचारों के कट्टर विरोधी हैं और यदि वश चले तो अपनी स्मृति से भी डॉ.अंबेडकर के नाम को भस्म कर दें। दुनिया का कोई भी व्यक्ति ‘स्व-निर्मित’ नहीं होता। वह अपनी सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत और परिस्थितियों का उप-उत्पाद होता है और व्यक्ति के व्यक्तित्व और कृतित्व के निर्माण में उसके घर-परिवार, शिक्षक, मित्र, शुभचिंतक और ‘शत्रुओं’ का भी योगदान होता है। दुनिया का महान से महान व्यक्ति भी इस सूत्र से परे नहीं है। इसलिए डॉ.अंबेडकर के व्यक्तित्व और उनके विचारों को समझने के लिए महात्मा बुद्ध से लेकर संत कबीर, संत रविदास और महात्मा फुले तक की बौद्धिक विरासत को समझना आवश्यक है। दूसरे, दुनिया का हर महान व्यक्ति एक विश्व-विरासत है, किसी के कॉपी राईट से परे। बौद्धिक विरासत अर्जित की जा सकती है, जो वंश, जाति, काल और भूगोल से परे है। निःसंदेह डॉ.अंबेडकर सिर्फ़ भारत के ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के धरोहर हैं, लेकिन एक वस्तुनिष्ठ सवाल तो बनता ही है कि जिस राष्ट्र को डॉ.अंबेडकर ने इतना सब कुछ दिया क्या उसी राष्ट्र के सत्ताशीन लोगों ने अंबेडकर को स्वीकार किया ? क्या उनके योगदानों को दबाने की साजिश नहीं की गई ? क्या वह समाज अंबेडकर को आज भी स्वीकार करता है ? इस प्रश्नों की पड़ताल जरुरी है। यदि जबाव न में है तो इस विमर्श से थोड़े समय के लिए इस वर्ग को अलग करता हूँ। रही बात OBC और ST वर्ग की। यह सत्य है कि इन दोनों वर्गों में डॉ.अंबेडकर की स्वीकार्यता नहीं रही, उचित जानकारी के आभाव में इन्हें लगता रहा कि डॉ.अंबेडकर ने इनके लिए कुछ या फिर कहिए कुछ ज्यादा नहीं किया। हालाँकि हाल के दिनों में इस वर्ग के कुछ उद्धमी और गंभीर बुद्धिजीवियों के सतत प्रयास से इस वर्ग में डॉ.अंबेडकर की स्वीकार्यता बढ़ी है।
भारत में डॉ.अंबेडकर पर सबसे ज्यादा कॉपीराईट का दावा करने वाला समुदाय है- अनुसूचित जाति वर्ग। डॉ.अंबेडकर ने 18मार्ग1956 को रामलीला मैदान, आगरा वाले अपने भाषण में कहा था, “हमारे समाज की शिक्षा में कुछ प्रगति हुई है। शिक्षा प्राप्त करके कुछ लोग उच्च पदों पर पहूँच गये हैं, परन्तु इन पढ़े लिखे लोगों ने मुझे धोखा दिया है। मै आशा कर रहा था कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे समाज की सेवा करेंगे, किन्तु मैं देख रहा हूँ कि छोटे और बड़े क्लर्कों की एक भीड़ एकत्रित हो गई है, जो अपना पेट भरने में व्यस्त हैं। मेरा आग्रह है कि जो लोग शासकीय सेवाओं में नियोजित हैं, उनका कर्तव्य है कि वे अपने वेतन का 20वां भाग (5%) स्वेच्छा से समाज सेवा के कार्य हेतु दें। तभी समग्र समाज प्रगति कर सकेगा अन्यथा केवल चन्द लोगों का ही सुधार होता रहेगा। कोई बालक जब गांव में शिक्षा प्राप्त करने जाता है तो संपूर्ण समाज की आशायें उस पर टिक जाती हैं। एक शिक्षित सामाजिक कार्यकर्ता समाज के लिये वरदान साबित हो सकता है।” यह डॉ. अंबेडकर का आत्म-परक अनुभव था। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि अंबेडकर के विचारों और उनके व्यक्तित्व को पढ़े-लिखे लोगों ने ही पुनर्जीवित किया है। 21वीं सदी का यह दौर त्रासदी का युग है। जहाँ एक ओर दुनिया भर में अंबेडकर की स्वीकार्यता बड़ी है, वहीं दूसरी ओर अंबेडकर को दैवीय बनाने की साजिश भी चल रही है- अर्थात् अंबेडकर को पूजो, फूल-माला चढ़ाओ, भजन-कीर्तन करों, लेकिन उनके विचारों को न पढ़ो और न अपनाओ। बहरहाल त्रासदी के इस मोड़ पर, डॉ.अंबेडकर को लेकर अनुसूचित जाति के बीच ही दावेदारी का जो संघर्ष है, उसकी समीक्षा जरुरी है। यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो इस प्रक्रिया में दो तरह के लोग हैं: पहला, वैसे लोग जो वास्तव में अंबेडकर की बौद्धिक और राजनीतिक समझ के अनुरूप काम करने का प्रयास कर रहे हैं। ध्यान देने की जरुरत है, ‘प्रयास कर रहे हैं’! ऐसे लोगों, कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की संख्या बहुत कम है। एक दूसरे तरह के अंबेडकरवादी भी हैं, जिन्होंने अंबेडकर को अपने-२ हित और सुविधा के लिए अलग-२ खानों में बाँट लिया है। यदि आम शब्दों में कहें तो- महार अंबेडकरवादी, चमार अंबेडकरवादी, दुसाध अंबेडकरवादी, धोबी अंबेडकरवादी, पासी अंबेडकरवादी, वाल्मीकि अंबेडकरवादी इत्यादि। यदि अभी अंबेडकर जीवित होते तो शायद बहुत दुखी होते। अंबेडकर की विरासत का यह वर्गीकरण वस्तुतः अंबेडकर के विचारों की हत्या करना है और वैसी विचारधारा का पोषण करना है जिसके विरुद्ध अंबेडकर आजीवन संघर्ष करते रहे और अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाकर घृणा और असमानता पर आधारित ‘हिन्दू’ धर्म का परित्याग किया।
यह जाति है की जाती ही नहीं और न जाएगी। जाति जन्मना है, अर्थात् एक व्यक्ति अपनी राष्ट्रीयता, धर्म, संस्कृति, भाषा, खान-पान बदल सकता है. परन्तु उसकी जाति नहीं बदलती। गर्भ धारण में ही व्यक्ति की जाति तय हो जाती है और इस सृष्टि के जीवित रहने तक उसकी जातीय पहचान बनी रहती है। अंबेडकर के काल में भी जातियां थीं और अंबेडकर को न सिर्फ़ उनके विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा जो उनके नैसर्गिक शत्रु थे बल्कि उनके विरुद्ध भी संघर्ष करना पड़ा जो तथाकथित उनके ‘अपने’ थे। अंबेडकर को ‘अछूतों' ने भी काले झंडे दिखाए, आक्रमण किए, विरोध किया। लेकिन क्या अंबेडकर ने जाति की बात की या जमात की ? निःसंदेह डॉ.अंबेडकर ने ‘जमात’ को आधार बनाया। अब यह समझना पड़ेगा कि अंबेडकर के ‘अनुयायियों’ ने ही अंबेडकर को जातीय खांचे में क्यों बाँट दिया ? इस स्थिति का सीधा कारण महत्वकांक्षी अनुसूचित मध्यम वर्ग के बीच व्यक्तिगत मुक्ति की चाहत और बेचैनी है। वर्ण व्यवस्था आधारित समाज में व्यक्तिगत मुक्ति के लिए हर समय स्पेस रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो प्राचीन काल में शूद्र कुल में जन्मे बहुत सारे राजा और अधिकारी नहीं होते। व्यक्तिगत मुक्ति से किसी व्यक्ति की सामाजिक हैसियत (Social Status) बढ़ सकती है अर्थात् वह सांसद, विधायक, मंत्री, अधिकारी, संपन्न बन सकता है, लेकिन सामाजिक कद (Social Stature) बढ़ाने के लिए व्यक्ति और जाति नहीं बल्कि जमात की समस्या का समाधान जरुरी है। कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें जो अधिकार और सुरक्षा प्राप्त हुए हैं, वे जाति के कारण प्राप्त हुए हैं। इस तरह के विचार में मैं विनम्रता के साथ संशोधन करना चाहता हूँ। संविधान के प्रावधानों और आपके जाति प्रमाण पत्र पर एक बार गंभीरता से नज़र डालने की जरुरत है। जाति-व्यवस्था पर डॉ.अंबेडकर के जीवन भर के परिश्रम और शोध की परिणति आप संविधान के प्रावधानों में पाएंगे। उन्होंने हजारों विखंडित जातियों और समुदायों को वर्ग में तब्दील किया अर्थात SC, ST, OBC और सबकी सुरक्षा के लिए संविधान में प्रावधान किए- OBC के लिए Article 340, SC के लिए Article 341 और ST के लिए Article 341। पिछड़े वर्ग के साथी ध्यान से देखें, डॉ. अंबेडकर ने संविधान में सबसे पहले OBC के लिए प्रावधान किया अर्थात डॉ.अंबेडकर ने जमात के अधिकार सुरक्षित किए, जिसमें जाति सन्निहित है।
👉जाति और जमात :- महात्मा गौतम बुद्ध से लेकर मा. कांशीराम तक की बौद्धिक विरासत को देखें तो सबने ‘जमात’ की वकालत की और महान बने। मा.रामबिलास पासवान- 1990 के दशक तक ‘जमात’ की बात करते थे- उस समय देश के एक बड़े नेता थे। अब जाति क्या परिवार तक उतर आये हैं। उनकी स्थिति का मूल्यांकन आप स्वयं करें। डॉ.उदित राज- पहले रामराज थे और दलित कर्मचारियों का फेडरेशन चलाते थे, देश में बड़े नेता माने जाते थे, आज उनकी हालत का मूल्यांकन भी आप को ही करना है। जब सुश्री मायावती ने कांशीराम जी के बहुजन को ‘जाटव-जन’ और ‘सर्वजन’ अर्थात शोषकों को भी तरजीह और मा.मुलायम सिंह और उनके आधुनिक शिक्षा प्राप्त पुत्र मा.अखिलेश यादव ने लोहिया के समाजवाद को ‘यादव-जन’ में तब्दील कर दिया तब 2017 के चुनाव में क्या हालत हुई आप स्वयं जानते हैं। दोनों को रात में बुरे-बुरे सपने आते होंगे। सनद रहे, विशुद्ध ‘स्व-जातीय’ राजनीति करने वालों में ‘परिवारवादी’ होने की प्रबल संभावना होती है।
डॉ.अंबेडकर यदि सिर्फ़ व्यक्तिगत और जातिगत मुक्ति की बात किए होते तो आज हम उनकी जयंती नहीं मना रहे होते। जाति की राजनीति में व्यक्तिगत मुक्ति संभव, लेकिन वंचित समाज की मुक्ति के लिए ‘जमात’ की राजनीति पहली शर्त है।
उनकी पूजा करने की बजाय उनके आदर्शों पर चलें......!
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