धम्म प्रभात
🌻धम्म प्रभात🌻
मध्यम मार्ग - सम्यक दृष्टि-सम्मा दिठ्ठि
दुःख - निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग
अरिय अट्ठंगिको मग्गो - आर्य अष्टांगिक मार्ग
"यह जो कामोपभोग का हीन, ग्राम्य, अशिष्ट, अनार्य, अनर्थकर जीवन है और यह जो अपने शरीर को व्यर्थ क्लेश देने का दुःखमय, अनार्य, अनर्थकर जीवन है, इन दोनों सिरे की बातों से बचकर तथागत ने मध्यम मार्ग का ज्ञान प्राप्त किया है जो आँख खोल देनेवाला हैं, ज्ञान करा देनेवाला हैं, शमन के लिए, अभिज्ञा के लिए, बोध के लिए, निर्वाण के लिए होता हैं।
वह आर्य अष्टांगिक मार्ग दुःख - निरोध की ओर ले जानेवाला हैं।
यह श्रेष्ठ मार्ग का प्रथम अंग हैं - - सम्यक दृष्टि।
तथागत बुद्ध ने कहा -
भिक्खुओं ! सम्यक दृष्टि कोन सी होती हैं?
भिक्खुओं! जिस समय आर्य श्रावक दुराचरण को पहचान लेता है, दुराचरण के मूल को पहचान लेता है, सदाचार को पहचान लेता है. सदाचार के मूल कारण को पहचान लेता है, तब उसकी दृष्टि, इस कारण से सम्यक दृष्टि-सीधी दृष्टि कहलाती हैं।
भिक्खुओं! सदाचरण सम्यक दृष्टि हैं।
सदाचरण का मूल कारण लोभ का न होना है।
सदाचरण का मूल कारण द्वेष का न होना हैं।
सदाचरण का मूल कारण मोह का न होना हैं।
अविद्या को जान लेना सम्यक दृष्टि हैं।
अनात्मभाव को जान लेना सम्यक दृष्टि हैं।
अनात्मभाव को जान लेना सम्यक दृष्टि हैं।
यथार्थ ज्ञान, यथार्थ समझ - सभी संस्कार दुःख हैं, सभी संस्कार अनित्य हैं, सभी मनोधर्म अनात्म हैं को जान लेना ही सम्यक दृष्टि हैं।
दुःख, दुःख का कारण, दुःख निरोध और दुःख निरोध का मार्ग इन चारों श्रेष्ठ सत्यों के साक्षात्कार को सम्यक दृष्टि कहते हैं।
सम्यक दृष्टि के दो भेद हैं - लोकोत्तर सम्यक दृष्टि और लोकिय सम्यक दृष्टि।
इनमें से प्रथम सम्यक दृष्टि केवल श्रोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी तथा अर्हत व्यक्तियों को होती हैं।
मध्यम मार्ग - सम्यक दृष्टि-सम्मा दिठ्ठि
दुःख - निरोध की ओर ले जानेवाला मार्ग
अरिय अट्ठंगिको मग्गो - आर्य अष्टांगिक मार्ग
"यह जो कामोपभोग का हीन, ग्राम्य, अशिष्ट, अनार्य, अनर्थकर जीवन है और यह जो अपने शरीर को व्यर्थ क्लेश देने का दुःखमय, अनार्य, अनर्थकर जीवन है, इन दोनों सिरे की बातों से बचकर तथागत ने मध्यम मार्ग का ज्ञान प्राप्त किया है जो आँख खोल देनेवाला हैं, ज्ञान करा देनेवाला हैं, शमन के लिए, अभिज्ञा के लिए, बोध के लिए, निर्वाण के लिए होता हैं।
वह आर्य अष्टांगिक मार्ग दुःख - निरोध की ओर ले जानेवाला हैं।
यह श्रेष्ठ मार्ग का प्रथम अंग हैं - - सम्यक दृष्टि।
तथागत बुद्ध ने कहा -
भिक्खुओं ! सम्यक दृष्टि कोन सी होती हैं?
भिक्खुओं! जिस समय आर्य श्रावक दुराचरण को पहचान लेता है, दुराचरण के मूल को पहचान लेता है, सदाचार को पहचान लेता है. सदाचार के मूल कारण को पहचान लेता है, तब उसकी दृष्टि, इस कारण से सम्यक दृष्टि-सीधी दृष्टि कहलाती हैं।
भिक्खुओं! सदाचरण सम्यक दृष्टि हैं।
सदाचरण का मूल कारण लोभ का न होना है।
सदाचरण का मूल कारण द्वेष का न होना हैं।
सदाचरण का मूल कारण मोह का न होना हैं।
अविद्या को जान लेना सम्यक दृष्टि हैं।
अनात्मभाव को जान लेना सम्यक दृष्टि हैं।
अनात्मभाव को जान लेना सम्यक दृष्टि हैं।
यथार्थ ज्ञान, यथार्थ समझ - सभी संस्कार दुःख हैं, सभी संस्कार अनित्य हैं, सभी मनोधर्म अनात्म हैं को जान लेना ही सम्यक दृष्टि हैं।
दुःख, दुःख का कारण, दुःख निरोध और दुःख निरोध का मार्ग इन चारों श्रेष्ठ सत्यों के साक्षात्कार को सम्यक दृष्टि कहते हैं।
सम्यक दृष्टि के दो भेद हैं - लोकोत्तर सम्यक दृष्टि और लोकिय सम्यक दृष्टि।
इनमें से प्रथम सम्यक दृष्टि केवल श्रोतापन्न, सकृदागामी, अनागामी तथा अर्हत व्यक्तियों को होती हैं।
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