बोधिसत्व

बाबा साहब का बोधिसत्व होने का मतलब जानिए

● उससे पहले जान ले बोधिसत्व होता क्या है?
● बौद्ध धर्म में बोधिसत्व का मतलब प्रबुद्ध होता है। सीधे शब्दों में बुद्ध का अवतार कहा जाता है। गौतम बुद्ध का कहना था की न मैं पहला हूँ न अंतिम। बुद्ध पहले भी हुए और आगे भी होंगे। इसी को आधार बना कर बुद्ध के अवतार को बोधिसत्व कहा जाता है।
● बाबा साहब आंबेडकर जब बर्मा में बौद्ध सम्मलेन में भाग लेने के लिए गए तब वहाँ उन्होंने बौद्ध धर्म पर काफी ओजस्वी भाषण दिया और भारत में बौद्ध धर्म की वापसी की बात कही उनका जब भाषण समाप्त हुआ तो वहाँ उपस्थित सभी भिक्षु अपना सिर झुकाकर डॉ. आंबेडकर को नमन करने लगे और कहा यही हैँ बोधिसत्व जिनका इन्तेज़ार सदियों से हो रहा है और सभी ने एक मत से डॉ. आंबेडकर में आस्था जताते हुए बौद्ध धर्म की सारी धर्म ग्रन्थ सौंप दी और उनके कहे अनुसार धर्म में परिवर्तन के लिए भी राजी हो गए।
ऐसा इसलिए हुआ की...

● बर्मा देश में यह मान्यता थी कि बुद्ध महापरिनिर्वाण के 2500 साल पूर्ण होने पर ‘भारत में बुद्ध का धर्म फिर से गतिमान होकर विश्वकल्याण के मार्ग को प्रसस्त करेगा और यह  बोधिसत्व भारत में प्रकट होगा और अपनी बौद्ध संस्कृति के गौरव को वापस अपने देश में लाएगा।
● यह बर्मावासीयों कि मान्यतता अकारण नही थी ?
इसका भी एक कारण है |
● सम्राट अशोक के गुरु महास्थवीर माेगलिपुत्त तिष्य द्वारा बर्मा देश में सोन और उत्तर नाम के दो अर्हंत बौध्द भिक्षुओं को धर्म प्रचार के लिए भेजते हुए ये यह भविष्वाणी कि थी कि बुद्ध के महापरिनिवार्ण से 500 साल बाद बुद्ध का धम्म लुप्त हो जायेगा एवं बुद्ध के महापरिनिर्वाण के 2500 साल बाद फिर से भारत में बुद्ध का धम्म मानव कल्याण के लिये पुनः जीवित होगा।
● तब तक इस धम्म को मूल रूप में जिन्दा रखना जब तक की कोई बोधिसत्व आकर अपने संपति को यानी धम्म (धार्मिक पुस्तकें) को वापस न ले जाये। यह मान्यता बर्मा में काफी प्रचलित थी।

● महास्थवीर मागलिपुत्त तिष्य की भविष्यवाणी सिर्फ काल्पनीक मान्यताओं का लेखा नही था,बल्कि वास्तिविकता थी।
● उलेखनीय है की डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने लाखों लोंगो को ‘धर्म दिक्षा’ दिया वह  दिन 14 October, 1956 था और बुध्द संवत् (Calendar) के अनुसार यह दिन अशोका विजयादशमी था और इसी दिन को ही 2500
साल पूर्ण होते हैं।
● महास्थवीर मोगलीपुत्त तिष्य के भविष्वाणी को भारत के धरती पर किसी ने क्रिर्यान्वित किया है वह मात्र डॉ.बी.आर.आंबेडकर है। इसलिए उनको बोधिसत्य कहा जाता है।
● डॉ.  बी.आर. आंबेडकर ने कभी यह नही कहा कि मै 14 october 1956 को ‘धम्मदिक्षा’ लेकर ‘धम्मदिक्षा’ दुंगा, बल्कि स्पष्ट रूप से कहा कि मै अशोक विजयादक्षमी को ‘धम्म दिक्षा’ लुंगा और दुंगा क्योंकि यह दिन सम्राट अशोक का ‘विश्व धम्म विजय’ दिन है।
● डॉ. बी. आर. आंबेडकर आगे यह भी स्पष्ट करते है कि ‘धम्मदिक्षा’ दिन को अशोक विजयादशमी के उपल्क्ष्य में हर्ष-उल्लहास के साथ मनाये ताकि यह ‘धम्मविजय’ दिन विश्वधम्म दिन बनकर चिर विस्मृत बना रहे।
● यह कोई संयोग नहीं था की अशोक विजयादक्षमी के दिन ही RSS कि भी स्थापना कि गई क्योंकि इनके पुर्वजों ने इस दिन को अंतिम मौर्य सम्राट ब्रहद्त कि हत्या की थी।
● डॉ. आंबेडकर भारत में बुद्ध धर्म के नायक के साथ साथ करोड़ों बहुजनों के भगवान भी है। आज सभी जगह उनकी प्रतिमाएं लगाई जा रही है। लोग उनके मूर्तियों को साक्षी मानकर शादी भी कर रहे है और अन्य धार्मिक काम भी कर रहे है। कोई भी प्रोग्राम होता है तो पहले डा. आंबेडकर और बुद्ध को श्रद्धासुमन अर्पित किया जाता है।
● डॉ. आंबेडकर के बोधिसत्व होने के कारण बोधगया में महाबोधि मंदिर के ही करीब उनकी बड़ी सी प्रतिमा लगायी गयी है। इस प्रतिमा में बाबा साहब की हाथ की ऊँगली मुख्य मंदिर की ओर इशारा करती हुई  लगायी गयी है जैसे वे अपने अनुयाइयों को कह रहे हो 'चलो बुद्ध की ओर' यही तुम्हारा धर्म है।
नमो बुद्धाय

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