तृष्णा

🌻धम्म प्रभात🌻

                 उपादान

 (रागयुक्त ग्रहण - तीव्र लालसा)
(प्रतीत्य समुत्पाद की नवमी कडी)

तण्हा पच्चया उपादान ।
तृष्णा के कारण (प्रत्यय)  से उपादान।

तृष्णा से आसक्ति या उपादान उत्पन्न होता हैं।

किसी वस्तु के प्रति राग पैदा करके उसे ग्रहण करना या ग्रहण करने की इच्छा का होना उपादान कहलाता हैं।
इंद्रियों द्वारा इंद्रियों के विषयों (रूप, शब्द, गंध, रस, स्पर्श) के साथ संपर्क =स्पर्श किए जाने पर होने वाली अनुभूति के परिणाम स्वरूप उन अच्छे लगने वाले विषयों को ग्रहण करना अथवा उनके प्रति रागयुक्त हो उन्हें या उनके से किसी एक को ग्रहण करने की इच्छा करना ही उपादान हैं।

तथागत बुद्ध ने कहा - -
"भिक्षुओं! ये चार उपादान हैं।
कौन से चार?

1) काम (इंद्रिय भोग) - उपादान
2) दृष्टि (धारणा) - उपादान
3) शील व्रत - उपादान
4)आत्मवाद-उपादान

भिक्षुओं ! ये चार उपादान किस निदान (कारण) वाले, किस समुदय वाले, किस जाति वाले (प्रभाव) वाले हैं?

ये चारों उपादान तृष्णा निदान वाले, तृष्णा समुदय वाले, तृष्णा जाति वाले, और तृष्णा प्रभाव वाले हैं। "
ये सब दृष्टियां उपादान तृष्णा से ही उत्पन्न होती है।

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