आष्टांग मार्ग के अनुसार II
आष्टांग मार्ग के अनुसार
शील
सम्यक कर्मान्त :-
सम्यक कर्मान्त हमे कुशल ब्यवहार की शिक्षा देता है जिसमे किसी दूसरे ब्यक्ति की भावनाओ और अधिकारों की क्षति न पहुंचे तथा हमारे कार्य का समन्वय जीवन के मुख्या नियमो स अधिक से अधिक हो सके. जीव हिंसा, मिथ्याचार, चोरी, ब्यभिचार रहित कर्म करना ही सम्यक कर्मान्त है.
सम्यक आजीविका :-
सम्यक आजीविका इस प्रकार की होनी चाहिए जिसमें किसी की हानि न हो न ही किसी के प्रति अन्याय हो। सामान्य स्थितियों में हमें हथियारों का ब्यापार, प्राणियों का ब्यापार, मांस का ब्यापार, मद्य का ब्यापार व विष का ब्यापार नहीं करना चाहिए। यही वास्तविक सम्यक जीविका है।
सम्यक ब्यायाम :-
सम्यक ब्यायाम का तातपर्य है इंद्रियों पर संयम रखना, बुरी भावनाओ को रोकना, बुर कार्यो से बचना, अच्छी भावनाओ का उतपन्न करने का प्र्याश करना तथा उतपन्न अच्छी भावनाओ को कायम रखना.
समाधि
सम्यक स्मृति :-
सम्यक स्मृति का मतलब यह है कि मन की सतत जागरूकता के द्वारा मन में उतपन्न अकुशल विचारो का मन में सदैव स्मरण रखना। काया वेदना चित्त और उचित स्थितियों का ज्ञान उसके मलिन होने व क्षण भंगुर होने का ज्ञान रखना सम्यक स्मृति है।
सम्यक समाधि :-
समाधी का मतलब है केवल चित्त को एकाग्र करना जबकि सम्यक समाधी का मतलब है की चित्त में स्थाई परिवर्तन। लोभ, दोष, आलयश्य, विचिकित्सा तथा अनिश्चय आदि बाधाओं के बंधनो को समाधी के द्वारा ही तोडा जा सकता है। सम्यक समाधि मन को कुशल और हमेशा कुशल ही कुशल सोचने की आदत डालती है। इससे वह शक्ति मिलती है जिससे ब्यक्ति कल्याण रत रहता है।
अगले अंक में जाने बौद्ध की पारमिताएं।
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