अष्टांग मार्ग के अनुसार

अष्टांग  मार्ग के अनुसार

प्रज्ञा 

सम्यक दर्ष्टि :-

                    सम्यक दर्ष्टि का तातपर्य  यह है कि जो वास्तु प्राकृतिक रूप में जैसी है, उसको वैसा ही समझना अर्थात चार आर्यो का दर्शन करना , समझाना , प्रतीत्यसमुत्पाद का ज्ञान होना, इस प्रकार समस्त धर्मो के स्वाभाव को जानना कि संस्कार अनित्य है, सभी संस्कार दुख हैं, सभी संस्कार अनात्म हैं, का बोधा होना ही सम्यक दर्ष्टि है. 

सम्यक संकल्प :-

                       सम्यक संकल्प का अर्थ है कि  राग, हिंसा तथा प्रतिहिंसा रहित संकल्प रखना। अर्थात हमारी आशाएं, आकांछाएं एवं महत्वकांछाएं ऊँचे स्तर की हों, निम्न स्तर की न हों तथा हमारे योग्य हो अयोग्य नहीं। 

सम्यक वाणी :-

                     इसका अर्थ यह है कि -
 १. सत्य  बोलना।  
२. दुसरो की बुराई न करना।  
३. दुसरो के बारे में झूठी बाटे न फैलाना। 
 ४. किसी के प्रति गाली गलौज या कठोर वचन न बोलना। दूसरे शब्दो में , विनम्र-वाणी का प्रयोग करना।  
५. बुद्धि संगत, सार्थक तथा उद्देश्य पूर्ण वाणी को ब्यवहार में लाना और बेकार की मूर्खता पूर्ण  बचाना। 
६. धम्मानुकूल बातों का बोलना।  
     सम्यक वाणी का ब्यवहार न किसी के भय की अपेक्षा करता है और न किसी के पक्षपात की. उसका किसी के निजी लाभ अथवा हानि से कोई तातपर्य नहीं। 


                     शील व समाधि के विषय में अगली पोस्ट का अवलोकन करें।

                  


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