गुलामी का त्याग

गुलामी का त्याग


कब तक और डरोगे,कितनी मार खाओगे,गेरों की।
कान पे जाकर चार लगा दो,नींद खोल दो बहरों की।
कब तक नीच रहोंगे,कितनी सेवा करोगे,गेरों की।
थोडी हिम्मत जरा दिखाओ,धूल चटा दो पैरों की।
न धन दौलत,नहीं जमीनें,करी गुलामी,गेरों की।
अपने दम पर राज करो तुम,चमक उडा दो,चैहरों की।
बहुत सहा,अब नहीं सहेगें,तोड दो हडडी,पैरों की।
तुम भी तो बलबान बने हो,चीरो छाती गैरों,की।
रोके से कोई रोक न पाये,परबाह करो,न पहरों,की।
भीमराव,ज्योतिवा,पढलो,बात मान लो,वीरों की।
शूद्र,अछूत,लिखा है,जिनमें,फाड दो बुक उन गेरों की।
शिक्षा का अधिकार मिला है,करो पढाई,हीरों की।
डर के जीना भी क्या जीना,खुल के सोचो जीने की।
फेशन बाले कपडे पहनो,बटन खोल दो सीने की।
फोकट रहकर समय न काटो,कोई बजह लो जीने की।
घर में खुशिंयां तभी मिलेंगी,आदत छोड दो पीने की।
कलमवीर तुम बन सकते हो,लिख दो बातें,तीरों सी।
डरे-डरे से अब न रहना,बात करो तुम वीरों सी।

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