पाखंड
पाखंडी कविता
खूब पूजे ब्रह्मा विष्णु और महेश ।घर में बचा ना कुछ भी शेष ।।
खूब कराये यज्ञ और हवन ।
घर बेचकर पहुँच गए वन ।।
खूब घूमें तीर्थ यात्रा ।
घर में बची ना अन्न की तनिक भी मात्रा ।।
खूब गंगा जमुना नहाये ।
लौट के बुद्धू घर को आये ।।
खूब पूजे लक्ष्मी गणेश ।
पैसा बचा ना एक भी शेष ।।
दिया पंडो को भी खूब दान ।
मिला नही कहीं भगवान ।।
पूजे खूब लक्ष्मण राम ।
घर के बिगड़े सारे काम ।।
किये खूब व्रत उपवास ।
अपना शरीर भी रहा ना पास ।।
खूब रखे पत्नी ने करवा चौथ ।
फिर भी पत्नी से पहले पति को आ गयी मौत ।।
खूब पूजे लक्ष्मी दुर्गा और काली माई ।
घर में रही ना एक भी पाई ।।
खूब बजाये मैंने मंदिर में घंटा ।
फिर भी भरा ना मेरा अंटा ।।
खूब चढ़ाये मैंने माला फूल ।
फिर भी साफ़ हुई ना मन की धूल ।।
खूब जलाई मैंने अगरबत्ती और धूप ।
फेफड़ो को धुआं जलाता खूब
इस कविता को अवश्य पढे
है ऊँच नीच का रोग जहाँ
मैं उस देश की गाथा गाता हूँ।
भारत में रहने वालों की
मैं दोगली बात बाताता हूँ।।
भगवानों के नाम यहाँ
मूर्ति पूजी जाती है।
मन्दिर में जाने वालों की
जाति पूछी जाती है।।
शूद्रों से दूर जहाँ
भगवान को रखा जाता है।
जहाँ इंसानो से भेदभाव
पशु को कहते माता है।।
ऐसे पाखण्डी लोगों का
पाखण्ड मैं बाताता हूँ।
है ऊँच नीच का रोग जहाँ
मैं उस देश की गाथा गाता हूँ।।
नाम धर्म का लेकर जहाँ
लोगों का शोषण होता है।
कर्महीन इंसान जहाँ
भगवान भरोसे सोता है।।
भगवानों के नाम जहाँ
डर फैलाया जाता है।
पढ़ा लिखा इंसान जहाँ
विवेकहीन हो जाता है।।
विश्व को कूटुम्ब कहने की
हक़ीक़त मैं बाताता हूँ ।
है ऊँच नीच का रोग जहाँ
मैं उस देश की गाथा गाता हूँ।।
दूल्हा नहीं बैठे घोड़ी पर
इस पर अगड़ी जाति अड़ती है।
बारात निकासी ख़ातिर जहाँ
पुलिस बुलानी पड़ती है।।
विद्या के घर में भी जहाँ
जाति से पंक्ति लगती है।
दान पुण्य के नाम यहाँ
एक ही जाति ठगती है।।
धर्म भीरू है लोग जहाँ
मैं उसके किस्से बाताता हूँ।
है ऊँच नीच का रोग जहाँ
मैं उस देश की गाथा गाता हूँ।।
शादी की ख़ातिर जहाँ
जाति देखी जाती है।
जाति का लेकर नाम जहाँ
गाली बोली जाती है।।
अगर अछूत प्रेम करे तो
फाँसी दे दी जाती है।
नीची जाति वालों में
दहशत फैलायी जाती है।।
परम्पराओं के नाम जहाँ
स्वार्थ का पोषण बाताता हूँ ।
है ऊँच नीच का रोग जहाँ
मैं उस देश की गाथा गाता हूँ।
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