रविवार की छुट्टी

आज के दिन से शुरू हुई Sunday की छुट्टी
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आज के ही दिन अर्थात 10 जून 1890 से रविवार/वीरवार/ इतवार/Sunday की छुट्टी नारायण मेघाजी लोखंडे के अथक प्रयासों से शुरू हुई थी। लोखंडे का जन्म जनपद ठाणे महाराष्ट्र में 09फरवरी1848 को हुआ था किन्तु इनका पैतृक गांव सासवड जनपद पुणे था। वे महात्मा ज्योतिबा राव फुलेजी के सत्यशोधक आन्दोलन के सजातीय कर्मठ कार्यकर्ता थे। उन्हें रविवार की छुट्टी और भारत में श्रमिक आंदोलन का जनक कहा जाता है। उनकी मृत्यु 08फरवरी 1897 को मुम्बई में हुई। भारत सरकार ने उनके सम्मान में 03 मई 2005 को 5 रुपये का एक डाक टिकट जारी किया।
      ब्रिटिश शासन के दौरान मिल मजदूरों को सातों दिन काम करना पड़ता था और उन्हें कोई छुट्टी नहीं मिलती थी। मजदूरों का काफी शोषण होता था। ब्रिटिश अधिकारी प्रार्थना के लिए हर रविवार को चर्च जाया करते थे लेकिन मजदूरों के लिए ऐसी कोई परंपरा नहीं थी। ऐसे में जब मजदूरों ने भी रविवार की छुट्टी की मांग की, तो उन्‍हें डरा-धमका कर शांत करा दिया गया। उस समय मिल मजदूरों के नेता लोखंडे ने 1881 में अंग्रेजों के सामने साप्ताहिक छुट्टी का प्रस्ताव रखा और कहा कि हमलोग खुद के लिए और अपने परिवार के लिए 6 दिन काम करते हैं, अतः हमें एक दिन अपने देश की सेवा करने के लिए मिलना चाहिए और हमें अपने समाज के लिए कुछ विकास के कार्य करने चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने मजदूरों से कहा कि रविवार हिंदू देवता “खंडोबा” का दिन है और इसलिए इस दिन को साप्ताहिक छुट्टी के रूप में घोषित किया जाना चाहिए। लेकिन उनके इस प्रस्ताव को ब्रिटिश अधिकारियों ने अस्वीकार कर दिया। लोखंडे यहीं नहीं रुके, उन्‍होंने अवकाश की मांग को लेकर लड़ाई जारी रखी। आखिर में 9 साल के लम्बे संघर्ष के बाद पहली बार 10 जून 1890 को ब्रिटिश सरकार ने रविवार को छुट्टी का दिन घोषित किया। हैरानी की बात यह है कि भारत सरकार ने कभी भी इसके बारे में कोई आदेश जारी नहीं किए हैं। इसके बाद में दोपहर की आधे घंटे की खाने की छुट्टी और हर महीने की 15 तारीख को मासिक वेतन दिया जाने लगा। यही नहीं लोखंडे की वजह से मिलों में कार्य आरंभ के लिए सुबह 6:30 का समय और कार्य समाप्‍ति के लिए सूर्यास्‍त का समय निर्धारित किया गया था।
      अधिकांश मूलनिवासी लोग रविवार की छुट्टी का दिन enjoy करने में बिताते हैं। उन्हें लगता है, हम इस छुट्टी के हक़दार है। क्या हमें यह बात पता है कि रविवार की छुट्टी हमें क्यों मिली या यह छुट्टी लोखंडेजी ने हमें क्यों दिलायी या इसके पीछे उस महान व्यक्ति का मकसद क्या था ? लोखंडेजी का यह मानना था कि सप्ताह के सातों दिन हम अपने परिवार के लिए काम करते है किन्तु जिस समाज की बदौलत हमें नौकरी मिली उस समाज की समस्या छुड़ाने के लिए हमें एक दिन की छुट्टी मिलनी चाहिए। इस भावना के साथ उन्होंने 9 वर्षों तक निरंतर आंदोलन किया तब जाकर हमें यह रविवार की छुट्टी मिली थी। क्या हम इसके बारे में जानते हैं ?  अनपढ़ लोगों को छोड़ो क्या पढ़े लिखे लोग भी इस बात को जानते हैं ? यदि जानते हैं तो क्या समझते भी हैं ? जहां तक हमारी जानकारी है, पढ़े लिखे लोग भी इस बात को नहीं जानते/ समझते ? अगर जानकारी होती तो रविवार के दिन enjoy नहीं करते बल्कि समाज का काम करते और अगर समाज का काम ईमानदारी से किया होता तो समाज में भुखमरी, बेरोजगारी, बलात्कार, गरीबी, लाचारी यह समस्या नहीं होती। इस रविवार की छुट्टी पर "मेरा" नहीं  "समाज" का हक़ है। किन्तु कोई बात नहीं, आज से ही सही हम रविवार के दिन को "Mutton Day" नहीं बल्कि "Mission Day" के रूप में काम करके Enjoy  करने का प्रयास करे ।

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