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पर्वो की विशेषता

मूलनिवासी पर्व (1) गुरु पूर्णिमा :- गौतम बुद्ध ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन सारनाथ में प्रथम बार पांच परिज्रावको को दीक्षा दी थी। ये दिन बौद्धों के जीवन में गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता था। बौद्ध धर्म समाप्त करने के बाद ब्राह्मण धर्म के ठेकेदारो ने इस पर कब्ज़ा किया। (2) कुम्भ मेला :- कुम्भ का मेला बौद्ध सम्राट हर्षवर्धन ने शुरू करवाया था जिसका उद्देश्य बुद्ध की विचारधारा को फैलाना था। इस मेले में दूर दूर से बौद्ध भिक्षु, श्रमण,राजा,प्रजा, सैनिक भाग लेते थे। बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इसको अपने धर्म में  लेकर अन्धविश्वास घुसा दिया। (3) चार धाम यात्रा :- बौद्ध धर्म में चार धामों का विशेष महत्त्व था। ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म के चार धामो को अपने काल्पनिक देवी-देवताओ के मंदिरो में बदल दिया और अपने धर्म से जोड़ दिया। (4) जातक कथाएँ :-  जातक कथाये बौद्ध धर्म में विशेष महत्त्व रखती है। इन कथाओ द्वारा बौद्धिस्ट की दस परमिताओं को समझाया जाता था। कुछ कथाये गौतम बुद्ध काल की और कुछ बाद की लिखी गयी है। बौद्ध धर्म समाप्त करने के पश्चात ब्राह्मणों ने इन कथाओ क...

सत्य व अर्धसत्य

आइये समाज में फैले कुछ षड्यंत्रों पर प्रकाश डालें :- अर्धसत्य ---फलां फलां तेल में कोलेस्ट्रोल नहीं होता है! पूर्णसत्य --- किसी भी तेल में कोलेस्ट्रोल नहीं होता ये केवल यकृत में बनता है । ✅ अर्धसत्य ---सोयाबीन में भरपूर प्रोटीन होता है ! पूर्णसत्य---सोयाबीन सूअर का आहार है मनुष्य के खाने लायक नहीं है! भारत में अन्न की कमी नहीं है, इसे सूअर आसानी से पचा सकता है, मनुष्य नही ! जिन देशों में 8 -9 महीने ठण्ड रहती है वहां सोयाबीन जैसे आहार चलते है । ✅ अर्धसत्य---घी पचने में भारी होता है पूर्णसत्य---बुढ़ापे में मस्तिष्क, आँतों और संधियों (joints) में रूखापन आने लगता है, इसलिए घी खाना बहुत जरुरी होता है !और भारत में घी का अर्थ देशी गाय के घी से ही होता है । ✅ अर्धसत्य---घी खाने से मोटापा बढ़ता है ! पूर्णसत्य---(षड्यंत्र प्रचार ) ताकि लोग घी खाना बंद कर दें और अधिक से अधिक गाय मांस की मंडियों तक पहुंचे, जो व्यक्ति पहले पतला हो और बाद में मोटा हो जाये वह घी खाने से पतला हो जाता है✅ अर्धसत्य---घी ह्रदय के लिए हानिकारक है ! पूर्णसत्य---देशी गाय का घी हृदय के लिए अमृत है,  पं...

असम्भव बीमारी का पूर्ण इलाज

कैंसर का  १०० प्रतिशत इलाज संभव  पपीते के पत्तो से बनी चाय किसी  भी स्टेज के कैंसर को सिर्फ ६० से ९० दिनों में जड़ से ख़त्म कर देगी  अभी तक लोगो ने केवल पपीते के पत्तो को बहुत ही सीमीत तरीके से उपयोग किया होगा जसे प्लेटलेट्स के कम होने पर या त्वचा संबंधी रोग हो जाने पर इसका उयपयोग किया  है. परन्तु पपीता यही तक सीमीत नहीं है इसके गुण और भी बहुत कुछ है.  पपीता प्राकृतिक शक्तियों से भरपूर है पपीता के सभी भागों फल, ताना , बीज, पत्तियां, जड़ , सभी के अंदर कैंसर की कोशिका को नष्ट करने और उसकी ब्रद्धी को रोकने का गुण बहुतायत पाया गया।    UNIVERSITY OF FLORIDA AND International Doctors And Researchers From US and Japan में हुए शोधो से पता चला है की पपीते के पत्तो में कैंसर की कोशिका  को नष्ट करने की छमता पाई जाती है . Nam Dang MD, Phd जो की एक शोध कर्ता हैं के अनुसार पपीता की पत्तियों से लगभग १० प्रकार का कैंसर समाप्त हो सकता है उनमे से  कुछ निम्न हैं  1. Breast cancer 2. Lung cancer 3. Liver cancer 4. Pancreatic...

संविधान से पहले कैसे थे पूर्वज

संविधान से पहले पूर्वज  हिन्दू का चोला पहने अंधेरे में जीने वाले इसे पढ़ो सायद ज़मीर जाग जाय आओ जाने और समझे, संविधान से पहले हमारे बाप दादा और हमारी पीढियां कहाँ, कैसे और किन हालातों में रहते थे = = = = = = = = = = = = = = = = 1 हम लोग कच्चे घरों में, तम्बूओं में, झोपडियो में अमीरों की हदों से हट कर गांव से बाहर तालाब किनारे रहते थे। 2 धर्म प्रथा, जाति प्रथा, सति प्रथा, छूत प्रथा, रीति रिवाज, संस्कृति, परंपराओं और अमीरों के अपने ही बनाए गए कायदे कानून के तहत हम गुलाम थे 3 अच्छा खाना, अच्छा पहनना, बडे लोगों की बराबरी करना, अपने हक के लिए लडना, और पढाई करने का हमें कोई भी हक नहीं था। 4 : हमारे वैद्य ( डाक्टर ),धर्म गुरु और हमारी पंचायतें भी अलग होती थी। 5 अमीर - गरीब, छोटे - बडे, ऊंच - नीच , और जातिवाद की दीवारें होती थी। 6 हम औरों के टुकडों पर पलने वाले थे। 7 हमारा अपना कुछ भी वजूद नहीं था। 8 समाज में हमारा आदर, मान , सम्मान,इज्जत, नाम और पहचान कुछ भी नहीं था। 9 हमें मनहूस समझा जाता था। 10 हमारी औरतों से मनचाही मनमानी और बदसलूकीया की जाती थी। 11 हमें गुलाम बना कर ख...

नाथू राम के विषय में विशेष

ऐसे 'बहादुर’, 'चरित्रवान’ और 'देशभक्त’ थे गांधी के हत्यारे नाथूराम एक टपोरी किस्म का व्यक्ति था जिसे कतिपय हिंदू उग्रवादियों ने गांधी की हत्या के लिए भाडे पर रखा हुआ था। जेल में उसकी चिकित्सा रपटों से पता चलता है कि उसका मस्तिष्क अधसीसी के रोग से ग्रस्त था...       महात्मा गांधी के हत्यारे गिरोह के सरगना नाथूराम गोडसे को महिमामंडित करने के जो प्रयास इन दिनों किए जा रहे हैं, वे नए नहीं हैं। गोडसे का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बताया जाता रहा है और इसीलिए गांधीजी की हत्या के बाद देश के तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि संघ गोडसे से अपने संबंधों को हमेशा नकारता रहा है और अपनी इस सफाई को पुख्ता करने के लिए वह गोडसे को गांधी का हत्यारा भी मानता है और उसके कृत्य को निंदनीय करार भी देता है। लेकिन सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के सत्तारूढ होने के बाद ही गोडसे को महिमामंडित करने का सिलसिला तेज हो गया? इस सिलसिले में एकाएक उसका मंदिर बनाने के प्रयास शुरू हो गए। उसकी 'जयंती’ और...

४० की उम्र अवस्य पढ़े

*ये उम्र चालीस की बड़ी अजीब होती है...!* न बीस का ज़ोश, न साठ की समझ, ये हर तरफ से गरीब होती है। *ये उम्र चालीस की बड़ी अजीब होती है...!* सफेदी बालों से झांकने लगती है, तेज़ दौड़ो तो सांस हाँफने लगती है। टूटे ख़्वाब, अधूरी ख़्वाहिशें, सब मुँह तुम्हारा ताकने लगती है। ख़ुशी बस इस बात की होती है, की ये उम्र सबको नसीब होती है। *ये उम्र चालीस की बड़ी अजीब होती है...* न कोई हसीना मुस्कुराके देखती है, ना ही नजरों के तीर फेंकती है, और आँख लड़ भी जाये जो गलती से, तो ये उम्र तुम्हें दायरे में रखती है। कदर नहीं थी जिसकी जवानी  में, वो पत्नी अब बड़ी करीब होती है *ये उम्र चालीस की बड़ी अजीब होती है...!* वैसे, नज़रिया बदलो तो शुरू से शुरवात हो सकती है, आधी तो अच्छी गुज़री है, आधी और बेहतर गुज़र सकती है। थोड़ा बालों को काला और दिल को हरा कर लो, अधूरी ख्वाहिशों से  कोई समझौता कर लो। ज़िन्दगी तो चलेगी अपनी रफ़्तार से, तुम बस अपनी रफ़्तार काबू में कर लो। फिर देखिए ये कितनी खुशनसीब होती है .. *ये उम्र चालीस की बड़ी अजीब होती है...!* *40 की उम्र के समीप (आस- पास) पहुचे सभी म...

बौद्ध परम्परा के अनुसार चतुर्मास /वर्षावास

चतुर्मास /वर्षावास                 ------------------------------------------------  वर्षावास जिसे पाली भाषा में वस्सावास कहा जाता है। वर्षावास का अभिप्राय किसी एक स्थान पर वास करना या निवास करना होता है । बौद्ध परंपरा में आषाढ़ मास की पूर्णमासी से वर्षावास प्रारंभ होता है और आश्विन मास की पूर्णमासी को समाप्त होता है । यह वर्षावास 4 माह का होता है । इसलिए इसे चतुर्मास भी कहते हैं । इस दौरान बौद्ध भिक्षु किसी एक बुद्ध विहार में रहकर अध्ययन करते हैं, ध्यान साधना करते हैं , ज्ञान अर्जन करते हैं , फिर पुनः वर्ष के शेष महीनों में भ्रमण या चारिका करने निकल पडते हैं। 1. आषाढ मास की पूर्णिमा को सिद्धार्थ गौतम मानवता के कल्याण के लिए गृहत्याग किए थे , जिसे महाभिनिष्क्रमण कहा जाता है। इसी दिन बोधगया में बुद्धत्व प्राप्ति के उपरांत सारनाथ/ इसीपत्तन में पंचवग्गीय भिक्षुओं को प्रथम बार धर्म उपदेश दिया था। पहला ज्ञान दिया था । इसलिए इसे धम्मचक्क पवत्तन कहा जाता है। 2. सावन मास की पूर्णमासी को बौद्ध धर्म परिषद द्वारा मगध नरेश बिंबसार के पुत्र अजातशत्रु...